
आज की यात्रा बहुत ही दर्दमयी रही, मगर उससे भी दर्दमयी हैं उन डिब्बों की कहानियाँ। यों तो मैंने काफी परेशानी झेली अपने सफर में, मगर इस परेशानी में सुनने मिलती हैं कुछ कहानियाँ, जो शायद आपको यूँ न सुनने मिलें। शायद अगर मेरी टिकट पक्की हो जाती, तो मैं न मिलता उस व्यक्ति से, जो 24 घंटे काम करता है, मगर फिर भी बिन टिकट सफर कर रहा है। क्यों? पता नहीं क्यों, मगर कर रहा है।
शायद मैं जितना खुलकर अपने बैचमैटों से बात नहीं करता, उससे ज्यादा तो मैं अजनबियों से बात कर लेता हूँ, फिर भी मैं एक्सट्रोवर्ट नहीं हूँ। खैर, कहानी पर वापस आते हैं। ट्रेन एक जगह से दूसरी जगह जाने का सिर्फ साधनमात्र नहीं है, बल्कि कहानियों का एक भंडार है, जो हर रोज इन जंक्शनों से एक जगह से दूसरी जगह अनदेखा चला जाता है। शायद उस ट्रेन की चलती आवाज या तो उन कहानियों को दबा दे रही है, या चीख-चीख कर कह रही है—मुझे सुनो, सुनने की कोशिश तो करो।
स्लीपर और ए.सी. क्लास के वे डिब्बे अब सोने में ज्यादा महफूज हैं, उनकी कहानियाँ अब शायद या तो खत्म हो गई हैं या सो रही हैं। लेकिन यह हाल शायद इंसानों की कहानियाँ जानने की जिज्ञासा खत्म होने के कारण या शायद कोई कारण है, जो भी कारण हैं। मगर मैं अभी भी जिज्ञासु हूँ। मैं सुनना चाहता हूँ कहानियाँ, ढेर सारी कहानियाँ, सिर्फ कोई सुनाने को बैठा हो।
मुझे नहीं मालूम, क्या यह ठीक है किसी की कहानी उसकी अनुज्ञा बिना सुनाई जाए। खैर, कुछ आम बातें तो बताई जा ही सकती हैं। मेरे बगल में बैठा 24-25 वर्षीय युवा था, जो दिन में किसी फैक्ट्री में काम करता और रात को गार्ड का काम करता। शायद नींद का अभागा है। खैर, नींद के तो दोनों ही अभागे हैं—फिर वह यह युवा हो या किसी बड़ी फर्म में काम कर रहा युवा। अमीर तो और भी अभागे हैं। बहरहाल, पढ़ाई में मन न लगना कारण है कि वह यह काम कर रहा है। अब यूँ तो इस कारण पर शक करने का कोई कारण मेरे पास है नहीं, मगर कुछ कहानियों में यह कारण शायद न हो।
मेरी पिछली बार की यात्रा में एक अंकल से बात हुई। अब यूँ तो वे अपने बच्चों को पढ़ा रहे थे, मगर 12 के बाद शायद पढ़ाने की इच्छा नहीं थी। क्यों? यह साफ-साफ पता नहीं, मगर नहीं पढ़ाना चाह रहे थे। तब मैं, जिसे फ्री में ज्ञान देने का शौक है, उन्हें यह मनवाने की कोशिश करने लगा कि—एक मजदूर कितना भी शारीरिक श्रम कर ले, मगर वह कभी भी दफ्तर में बैठे पढ़े-लिखे व्यक्ति से ज्यादा नहीं कमा सकता। मुझे उन श्रमिकों के श्रम का मूल्य नहीं है, यह समझने की गलती कदाचित न करिए। लेकिन यह बात तो सही ही है। समान वेतन का मुद्दा यों तो बस पुरुष-महिला के बीच में है, मगर व्हाइट कॉलर वर्कर्स और ग्रे कॉलर वर्कर्स के बीच असमान वेतन आज भी कोई खास मुद्दा नहीं है। खैर, इसके पीछे कुछ संरचनात्मक कारण भी हैं।
बहरहाल, हम अपनी कहानी पर वापस आते हैं। तो मैं उन्हें अपने बच्चों की पढ़ाई आगे जारी रखने के लिए प्रोत्साहित करने लगा। अब यह तो पता नहीं कि वे कितना समझे, मगर उम्मीद है, शायद समझे।
मेरे बगल में बैठे युवा को मैंने चाट डाला अपने सवालों से, अपनी कुछ बातों से। खैर, इतना काम इसलिए भी हो रहा है, चूँकि बहन की शादी भी धूमधाम से करनी है। यहाँ “धूमधाम से करनी है” ज्यादा महत्वपूर्ण है। मैंने पूछा—क्यों? क्योंकि बाकी दो बहनों की शादी भी धूमधाम से हुई, तो अब चाह है कि यह भी धूमधाम से ही हो। मेरे लिए पहली बात आश्चर्यजनक तो नहीं, मगर थोड़ी खीज खाने वाली है। यहाँ आप अपने लिए लंबे समय के लिए एक आरामदायक टिकट तो ले नहीं रहे, मगर शादी में आपको चमक पूरी चाहिए। मैं यहाँ उस व्यक्ति पर बिल्कुल भी नाराज नहीं हूँ। मैं नाराज हूँ इस रीत पर, जो चली आ रही है—रीत अपनी औकात से भी बड़ी शादी करने की। क्या उनका हक नहीं है धूमधाम से शादी करने का? मैं कहता हूँ, बिल्कुल है। लेकिन अपने जीवन की पूँजी शादी में खर्च कर देना या शादी के लिए कमाना बिल्कुल भी समझदारी वाली बात नहीं है। यों तो वह काफी समझदार है, और आशावादी भी। ऐसी ही और बातें हुईं, मगर शायद इतनी काफी हैं।
इस तरह लाखों कहानियाँ ट्रेन में सफर करती हैं, और सफर भी इंग्लिश वाला ‘सफर’, जिसकी बात मैंने अपने पुराने एक लेख में की है। समय मिले तो वह कहानी भी पढ़िएगा। साथ ही में सुनने की कोशिश करिए कहानियाँ, जो आपके आस-पास हैं और बस किसी को सुनाने का इंतजार कर रही हैं।
ऐसी ही और कहानी या ख्याल के साथ आपसे मुलाकात होगी अगले लेख में। इस बार शुद्ध हिंदी में लिखने का प्रयास किया है, कुछ अलग तरीके से अलग अंदाज में लिखने का प्रयास किया है। अगर यह पढ़ने का अनुभव थोड़ा सा अजीब सा रहा हो, तो यह संयोग नहीं है; यह शायद “दीवार में एक खिड़की रहती थी” का असर है।
आपके अपने अमूल्य समय के लिए धन्यवाद।




















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